“थिएटर की दुनिया” (world of theatre)

“थिएटर की दुनिया”
(world of theatre)

थिएटर ! नाम सुनते ही आपके मन में आता होगा ऑपरेशन थिएटर या सिनेमा थिएटर|
लेकिन मैं यहां जिस थिएटर की जिक्र कर रहा हूं वह है “रंगमंच” जिससे आप शायद अच्छी तरह वाकिफ होंगे | इसकी दुनिया इतनी बड़ी होती है कि आप शायद कल्पना भी नहीं कर सकेंगे | एक सच्चे रंगकर्मी की प्राथमिकता ही होती है “कला” |
हमारे देश के धुरंधर कलाकार /अभिनेता श्री राजपाल यादव जी, जो आज के समय में शायद परिचय के मोहताज नहीं है | इनका मानना है कि कला का आकार इतना बड़ा होता है कि उसमें पूरी तरह से समाने  के लिए एक कलाकार बस कोशिश ही कर सकता है | परंतु सौ प्रतिशत समाना असंभव है | थिएटर को आप नशा या दलदल भी कह सकते हैं ;क्योंकि यही हकीकत है ! क्योंकि जब शुरुआत में एक नया रंगकर्मी कला की दिशा में आने की चाहत रखता है तब उसकी सोच कुछ दिन रंगमंच करके आय कमाने की होती है | परंतु जैसे-जैसे रंगकर्मी सीढ़ियों से गुज़र के रंगमंच की और आगे बढ़ता है ,वह इस नशे और दलदल में घुसता चला जाता है |और आय का कोई स्रोत ना होने के बावजूद वह दिन-रात अभ्यास में लगा रहता है |
स्वाभाविक तौर पर आय का स्रोत होना कलाकार के लिए काफी जरूरी है इसलिए रंगकर्मी सालों तक रंगमंच करने के बाद सिनेमा की ओर अपना रुख मोड़ लेते हैं | हालांकि रंगमंच से इनका इतना ज्यादा लगाव होता है कि यह हमेशा जीवन भर रंगमंच अथवा थिएटर से जुड़े रहते हैं | कुछ कलाकारों का सीधा उदाहरण हम दे सकते हैं :नसीरुद्दीन शाह जी, नाना पाटेकर जी ,स्वर्गीय ओम पुरी जी, मनोज वाजपेई जी, एवं नवाजुद्दीन सिद्दीकी जी, अथवा तमाम और भी कलाकार हैं| आज के समय में भी ऐसे लोग हैं जो केवल रंगमंच ही करना चाहते है ; उसी के लिए जीना चाहते हैं | सिनेमा की ओर उनका कोई रुझान नहीं होता जबकि केवल रंगमंच से दो वक्त का खाना भी नसीब नहीं होता| जिसका सीधा उदाहरण है दिल्ली में मंडी हाउस, जिसे थिएटर हब माना जाता है | मंडी हाउस में हजारों थिएटर ग्रुप्स चलते हैं | जहां लोग कला के प्रति इतना पागल होते हैं कि वह बहुत ही कम उम्र में ही निदेशक के रूप में भी उभर आते हैं | मंडी हाउस एक ऐसी जगह है जहां देश के नामी गिरामी थिएटर तथा नाट्य विद्यालय जिसे हम राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय(NSD) के नाम से जानते हैं ,वह यही स्थित है | वैसे थिएटर केवल नाट्य रूपांतरण के लिए नहीं है | एक ऐसी जगह है जहां जीवन में सभी लोगों को कुछ समय ही सही लेकिन थिएटर करना चाहिए | यह एक ऐसी पवित्र जगह है जिसे शारीरिक तथा मानसिक विकास के लिए सक्षम माना जाता है | अक्सर कुछ लोग शर्मीले से होते हैं तथा जिनको शब्द चयन में कठिनाई होती है उसे थिएटर करने से काफी लाभ होता है |
अंततः थिएटर एक ऐसा माध्यम है जो लोगों के व्यक्तित्व विकास एवं व्यवहारिक होने में काफी मदद करता है |
एक सच्चे रंगकर्मी के लिए ;
थिएटर ही घर है ,
थिएटर ही मंदिर है ,
थिएटर ही परिवार है ,
अंततः थिएटर ही जिंदगी है ||

Report: Deepak Mahato

5 thoughts on ““थिएटर की दुनिया” (world of theatre)”

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